Thursday, December 25, 2008

सिटी bank

कोई दीवाना कहता है
कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी
को बस बादल समझता है
तू मुझसे दूर बैठी है
मैं तुझसे दूर बैठा हूँ
यह तेरा दिल धड़कता है , यह मेरा दिल धड़कता है

मेरी आंखों मैं आँसू हैं
बड़ी लम्बी कहानी है
तू समझे तो यह मोती है
न समझे तो यह पानी है
यह खाने मैं हमारे जो
परांठे हैं यह राबडी है
बस मत पुचो तुम हमसे अब
बड़ी लम्बी कहानी है

समुन्दर नीर का सैलाब
मगर रो भी नहीं सकता
उसे नम्बर का है प्रेशर
नहीं कोई दर्द समझता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुनले
जो मेरा हो नहीं पाया, वो तेरा हो नहीं सकता

दिवाली का महोत्सव है
खुदा भी देखता होगा
सिटी बैंक की तरक्की हो
यही बस सोचता होगा
यह बोनस क्या है
जीवन की है भोतिकता
समझ आए समझ लेना
न समझे तो नादानी है।

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