Sunday, October 12, 2008

दशहरा

वो भी क्या दिन थे दशहरे के ,जब हम मेला देखा करते थे
आंखों मैं उत्साह था, और दिल मैं आत्मविश्वास
बॉस की झिक- झिक , बीवी की टिक टिक
छोटे थे सपने , छोटी थी आशाएं
जीवन की वो अध्भुत धाराएँ

वो भी क्या दिन थे दशहरे के , जब हम मेला देखा करते थे



वो गुड्डा - गुडियों का सफर ,
Xbox aur ps से कहीं बेहतर था
वो कागज़ की नाव का बारिश के पानी मैं चलाना,
CRUISE SHIP के सफर से कहीं बेहतर था

वो भी क्या दिन थे दशहरे के जब हम मेला देखा करते थे



जलाना ही है तो TERRIRORIST रावन को जलाओ ,
उसके अन्दर के राम को जगाओ
जलाना ही है तो अन्धविश्वास मेघनाथ को जलाओ
उसे साइंस और लॉजिक की रह दिखाओ
जलाना ही है तो POLLUTION कुम्भकरण को जलाओ
गन्दगी को कम करके उसको पतला बनाओ
वो भी क्या दिन थे दशहरे के जब हम मेला देखा करते थे



आज जरूरत है राम की
बीस सर रूपी विचारों वाले राम की
पाँच सर दहेज़ निवारण और नारी अत्याचार को बचाने के लिए
एक सर पेड उगाने के लिए
तेराहं सर आंतकवाद को हटाने के लिए
और बचा हुआ एक सर , कुछ और राम बनाने के लिए
वो भी क्या दिन थे दशहरे के जब हम मेला देखा करते थे

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